९. अनमोल वाणी
कवि — संत कबीर व भक्त सूरदास | संपूर्ण स्वाध्याय, पद्य आधारित प्रश्न-उत्तर, और भाषा बिंदु। महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती)।
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स्वाध्याय (सूचना के अनुसार कृतियाँ करो)
- मन का अहंकार (आपा) दूर हो जाए।
- सुनने वाले (औरों) को शीतलता (शांति) मिले।
- स्वयं अपना मन भी शीतल (शांत) रहे।
- १. ठंडा = शीतल
- २. कोई = कोय
- ३. बलराम = हलधर
- ४. मक्खन = माखन
संत कबीरदास जी कहते हैं कि "जैसा भोजन खाइए, तैसा ही मन होय।" इसका अर्थ है कि हम जैसा अन्न या भोजन ग्रहण करते हैं, हमारा मन और विचार भी वैसे ही बन जाते हैं। सात्विक, शुद्ध और ईमानदारी से कमाए गए भोजन से हमारा मन पवित्र, दयालु और शांत रहता है। इसके विपरीत, बेईमानी से प्राप्त या तामसिक भोजन करने से मन में बुरे और अशांत विचार आते हैं। अतः मनुष्य को हमेशा सात्विक आहार ही लेना चाहिए।
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भाषा बिंदु
उदाहरण १: 'बुरा जो देखन मैं चला' (भूतकाल)
- वर्तमानकाल: मैं बुरा देखने चलता हूँ।
- भविष्यकाल: मैं बुरा देखने चलूँगा।
उदाहरण २: 'यह अजहूँ है छोटी' (वर्तमानकाल)
- भूतकाल: यह तब भी छोटी थी।
- भविष्यकाल: यह कल भी छोटी रहेगी।
उपयोजित लेखन व मौलिक सृजन
अर्थ: दोनों ओर भारी संकट होना या बचने का कोई मार्ग न दिखाई देना।
प्रसंग: एक बार जंगल में एक हिरण शिकारी कुत्तों से बचने के लिए तेज दौड़ रहा था। भागते-भागते अचानक उसके सामने एक गहरी और उफनती हुई नदी आ गई। यदि वह पीछे मुड़ता तो शिकारी कुत्ते उसे मार डालते, और यदि आगे बढ़ता तो नदी के तेज बहाव में डूबने का खतरा था। उस समय बेचारे हिरण की स्थिति ठीक 'आगे कुआँ पीछे खाई' वाली हो गई थी।
निर्मल जल सा पानी हो,
मीठी अपनी वाणी हो।
पीकर माता का दूध सदा,
जीवन की राह सुहानी हो।
'हाफ मैराथन' (लगभग २१ किलोमीटर की दौड़) में सफलता पाने के लिए मैं निम्नलिखित तैयारियाँ करूँगा:
- नियमित अभ्यास: दौड़ने का अभ्यास धीरे-धीरे शुरू करूँगा और प्रतिदिन अपनी क्षमता बढ़ाऊँगा।
- संतुलित आहार: शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए प्रोटीन, विटामिन और कार्बोहाइड्रेट युक्त पौष्टिक भोजन (Healthy diet) लूँगा।
- हाइड्रेशन: दौड़ते समय और दिन भर शरीर में पानी की कमी न होने दूँगा।
- उचित परिधान: दौड़ने के लिए आरामदायक खेल की पोशाक और अच्छे स्पोर्ट्स शूज का उपयोग करूँगा ताकि पैरों में चोट न लगे।
इस पाठ से मैंने समझा कि हमें हमेशा मीठी और विनम्र वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को और स्वयं को भी शांति मिले। साथ ही, भोजन और पानी की शुद्धता हमारे मन और विचारों को सीधा प्रभावित करती है। दूसरों में बुराई ढूँढ़ने से पहले हमें अपने भीतर की बुराइयों और कमियों को पहचानना चाहिए।