कक्षा ८ हिंदी · दूसरी इकाई

६. अंधायुग

डॉ. धर्मवीर भारती के गीतिनाट्य पर आधारित सभी कृतियों के संपूर्ण उत्तर — कृति, संजाल, पात्र, मुहावरे, वर्णविच्छेद और उपयोजित लेखन.

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सूचना के अनुसार कृतियाँ करो

१कृति करो।
१. वृद्ध ने इनका दायित्व लिया है —
संजय युयुत्सु अश्वत्थामा
२. अंधे युग में प्रभु का एक अंश —
निष्क्रिय रहेगा आत्मघाती रहेगा विगलित रहेगा
२संजाल पूर्ण करो — अश्वत्थामा के अनुसार नये अर्थ में व्यक्ति।
विकृत अर्धबर्बर आत्मघाती अनास्थामय
३उत्तर लिखो — कविता में प्रयुक्त पात्र।
युयुत्सु अश्वत्थामा वृद्ध

प्रस्तुत अंश में ये पात्र संवाद करते हुए दिखाई देते हैं। वृद्ध के माध्यम से मानव-भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व का विचार व्यक्त किया गया है।

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भाषा बिंदु

१पाठों में आए मुहावरों का अर्थ लिखकर उनका अपने स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग करो।
मुहावराअर्थवाक्य में प्रयोग
सिर खपाना बहुत बुद्धि लगाना इस कठिन प्रश्न को हल करने में मैंने बहुत सिर खपाया।
पसीना बहाना कड़ी मेहनत करना किसान खेत में पसीना बहाकर अन्न पैदा करता है।
खाली हाथ रहना पास में कुछ न होना बहुत प्रयास करने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिला और वह खाली हाथ रह गया।
२पढ़ो और समझो — वर्णविच्छेद पूर्ण करो।
शब्दवर्णविच्छेद
मानवीय म् + आ + न् + अ + व् + ई + य् + अ
सहायता स् + अ + ह् + आ + य् + अ + त् + आ
मृदुल म् + ऋ + द् + उ + ल् + अ
वाक्य व् + आ + क् + य् + अ
शब्द श् + अ + ब् + द् + अ
व्यवहार व् + य् + अ + व् + अ + ह् + आ + र् + अ

कल्पना पल्लवन

३‘मनुष्य का भविष्य उसके हाथों में है’ अपने विचार लिखो।

मनुष्य का भविष्य उसके कर्मों, विचारों और निर्णयों पर निर्भर करता है। वह अपने अच्छे कार्यों से जीवन को सुंदर और सार्थक बना सकता है। यदि मनुष्य मर्यादायुक्त आचरण करे, साहस और निर्भयता से कठिन परिस्थितियों का सामना करे तथा दूसरों के प्रति ममता और प्रेम रखे, तो समाज का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। इसके विपरीत स्वार्थ, हिंसा, नफरत और विनाशकारी विचार मानव-जीवन को संकट में डाल सकते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने दायित्व को समझकर वर्तमान में अच्छे कार्य करने चाहिए। हमारे आज के निर्णय ही आनेवाले समय की दिशा तय करते हैं। इस अर्थ में सचमुच मनुष्य का भविष्य उसके अपने हाथों में है।

उपयोजित लेखन

४निम्नलिखित मुद्दों के आधार पर कहानी लिखकर उसे उचित शीर्षक दो।

शीर्षक : हाथी की समझदारी

एक गाँव में एक दर्जी की छोटी-सी दुकान थी। उसी गाँव में एक हाथी रहता था। वह प्रतिदिन नदी पर नहाने के लिए जाते समय दर्जी की दुकान के सामने से होकर गुजरता था। दर्जी रोज उसे केले खिलाता था। धीरे-धीरे हाथी और दर्जी में अपनापन हो गया।

एक दिन दर्जी को मजाक सूझा। उसने हाथी को केला देने के बहाने उसकी सूँड़ में सुई चुभा दी। हाथी को बहुत दुख हुआ, लेकिन उसने तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह नदी पर गया और नहाने लगा। नहाने के बाद उसने अपनी सूँड़ में पानी भर लिया और वापस दर्जी की दुकान के सामने आकर दुकान तथा दर्जी पर पानी डाल दिया। दुकान का सामान भीग गया और दर्जी को अपनी गलती समझ में आ गई।

दर्जी ने हाथी से अपने व्यवहार के लिए क्षमा माँगी। उसे समझ आया कि किसी शांत प्राणी को भी बिना कारण परेशान नहीं करना चाहिए। उस दिन के बाद उसने कभी किसी जीव के साथ मजाक में भी दुर्व्यवहार नहीं किया।

तात्पर्य : दूसरों को बिना कारण कष्ट नहीं देना चाहिए। अपने व्यवहार का परिणाम कभी न कभी सामने आता है।