४. किताबें
गुलजार — कविता का भावार्थ, वाक्य पूर्ण कीजिए, पुस्तकें रखने के स्थान, उर्दू शब्दार्थ, शब्द-युग्म, रचना बोध और स्वाध्याय के संपूर्ण उत्तर।
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कविता का परिचय : प्रस्तुत नई कविता में प्रसिद्ध कवि गुलजार जी ने आधुनिक कंप्यूटर युग के प्रभाव के कारण पुस्तकों और मनुष्य के बीच बढ़ती दूरी, किताबों के प्रति घटती रुचि तथा उससे उत्पन्न मानसिक वेदना का अत्यंत भावुक और मार्मिक चित्रण किया है।
पाठ के आँगन में
(क) पाठ के आधार पर वाक्य पूर्ण कीजिए :
- किताबों की अब बनी आदत नींद में चलने की हो गई है।
- किताबें जो रिश्ते सुनाती थीं वह सारे उधड़े-उधड़े हैं।
(ख) लिखिए : किताबें यहाँ रखते थे-
(ग) आकृति : कविता में प्रयुक्त उर्दू शब्द तथा उनके अर्थ :
| उर्दू शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| हसरत | कामना, इच्छा, उम्मीद |
| सोहबत | संगत, साथ |
| कदरें | मूल्य, मायने |
| सफा | पन्ना, पृष्ठ |
| अल्फाज | शब्द |
| राब्ता | संपर्क, संबंध |
| जबीं | माथा |
| इल्म | ज्ञान |
| रुक्के | संदेश पत्र, चिट्ठी |
| रिहल | ठावनी जिसपर धर्मग्रंथ रखकर पढ़ा जाता है |
"किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से ................... गुजर जाती हैं 'कंप्यूटर के पर्दों पर'"
भावार्थ : कवि गुलजार जी कहते हैं कि आधुनिक कंप्यूटर और डिजिटल युग के आ जाने से मनुष्य की पुस्तकें पढ़ने की आदत छूटती जा रही है। अब किताबें अलमारी में बंद पड़ी रहती हैं और अलमारी के शीशों के पीछे से बड़ी हसरत और उम्मीद से मनुष्य की ओर ताकती रहती हैं कि कोई आए और उन्हें उठाकर पढ़े।
महीनों बीत जाते हैं लेकिन किताबों से मनुष्य का कोई संपर्क नहीं होता। एक समय था जब लोगों की शामें किताबों की संगति (सोहबत) में बीता करती थीं, पर आज वही शामें अक्सर कंप्यूटर, मोबाइल और लैपटॉप के पर्दों पर ही बीत जाती हैं। किताबों की उपेक्षा के इस दर्द को कवि ने यहाँ अत्यंत संवेदनशीलता से प्रकट किया है।
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पाठ से आगे
| मुद्दा | शासकीय ग्रंथालय का विवरण (नमूना) |
|---|---|
| ग्रंथालय का नाम | शासकीय संभागीय ग्रंथालय (District Central Library) |
| स्थापना-तिथि / वर्ष | १५ अगस्त १९५६ |
| संस्थापक का नाम | उच्च व तंत्र शिक्षण विभाग, महाराष्ट्र शासन |
| पुस्तकों की संख्या | लगभग ५५,००० से अधिक पुस्तकें |
| विषयों के अनुसार वर्गीकरण |
१. साहित्य विभाग : उपन्यास, कथा संग्रह, कविता संग्रह व नाटक (२०,०००) २. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी : भौतिकी, रसायन, संगणक व तकनीकी पुस्तकें (८,०००) ३. इतिहास एवं सामाजिक विज्ञान : इतिहास, समाजशास्त्र, भूगोल व राजनीति शास्त्र (१२,०००) ४. प्रतियोगी परीक्षा विभाग : MPSC, UPSC, बैंकिंग व सामान्य ज्ञान (१०,०००) ५. बाल साहित्य एवं संदर्भ ग्रंथ : बाल कहानियाँ, शब्दकोश व विश्वकोश (५,०००) |
भाषा बिंदु
| मूल शब्द | पूर्ण शब्द-युग्म | वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|
| घर - | घर - घर | दीपावली के पावन पर्व पर घर-घर में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। |
| उधड़े - | उधड़े - उधड़े | पुरानी फटी हुई किताब के सारे पन्ने और सिलाई उधड़े-उधड़े नजर आ रहे थे। |
| भला - | भला - बुरा | बिना किसी बात की सच्चाई जाने हमें किसी को भी भला-बुरा नहीं कहना चाहिए। |
| प्रचार - | प्रचार - प्रसार | गाँवों में स्वास्थ्य और स्वच्छता का प्रचार-प्रसार करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। |
| भूख - | भूख - प्यास | परीक्षा की तैयारी में लीन होने के कारण मोहित को अपनी भूख-प्यास की भी सुध नहीं रही। |
| भोला - | भोला - भाला | अमित स्वभाव से इतना भोला-भाला है कि वह सबकी बातों पर आसानी से विश्वास कर लेता है। |
रचना बोध
प्रस्तुत कविता 'किताबें' के माध्यम से कवि गुलजार जी हमें यह सीख देते हैं कि कंप्यूटर और इंटरनेट के युग में भी पुस्तकों का महत्त्व कम नहीं हुआ है। यद्यपि तकनीक से जानकारी और ज्ञान तुरंत मिल जाता है, किंतु किताबों को हाथों में लेकर पढ़ने का जो व्यक्तिगत स्पर्श (राब्ता) और आत्मिक आनंद है, वह स्क्रीन पर नहीं मिल सकता।
किताबें हमें मानवीय संवेदनाएँ, रिश्ते और संस्कार सिखाती हैं। अतः हमें तकनीक का समुचित उपयोग करते हुए भी पुस्तकों से अपना नाता नहीं तोड़ना चाहिए और प्रतिदिन पुस्तकें पढ़ने की आदत बनाए रखनी चाहिए।
अभिव्यक्ति एवं आसपास
हमारे जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है, क्योंकि गुरु ही हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। ठीक यही भूमिका ग्रंथ (पुस्तकें) भी निभाते हैं, इसलिए ग्रंथों को हमारा सच्चा और शाश्वत गुरु कहा गया है।
एक मनुष्य देह रूप में सदा हमारे साथ नहीं रह सकता, किंतु ग्रंथों में दर्ज महापुरुषों और संतों के विचार युगों-युगों तक हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। जब भी हम किसी दुविधा, निराशा या जीवन के संकट में होते हैं, तो ग्रंथ एक सच्चे मार्गदर्शक की भाँति सही और गलत का बोध कराते हैं। पुस्तकें हमें निस्वार्थ भाव से ज्ञान देती हैं और बदले में कुछ नहीं माँगतीं। इसलिए हमें अच्छी पुस्तकों को अपना गुरु और मित्र मानकर उनका अध्ययन करना चाहिए।
पुस्तकांचे गाव (भिलार) : महाराष्ट्र के सतारा जिले में महाबलेश्वर और पांचगणी के निकट स्थित 'भिलार' भारत का पहला 'पुस्तकों का गाँव' (Village of Books) कहलाता है। ब्रिटेन के 'हे-ऑन-वाई' (Hay-on-Wye) नगर की तर्ज पर महाराष्ट्र शासन द्वारा इसे वर्ष २०१७ में पुस्तकों के गाँव के रूप में विकसित किया गया।
इस गाँव की विशेषता यह है कि यहाँ के घरों, होटलों और मंदिरों में पर्यटकों एवं पाठकों के लिए पुस्तकें सजाकर रखी गई हैं। यहाँ मराठी साहित्य, कथा, कविता, इतिहास, बाल साहित्य, नाटक और पर्यावरण से संबंधित हजारों पुस्तकें उपलब्ध हैं। कोई भी पर्यटक यहाँ बैठकर नि:शुल्क पुस्तकें पढ़ सकता है। यह पहल वाचन संस्कृति को जीवित रखने का एक अद्भुत प्रयास है।