६. 'पृथ्वी' से 'अग्नि' तक
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रचित आत्मकथा अंश 'पृथ्वी से अग्नि तक' का संपूर्ण स्वाध्याय, प्रश्न-उत्तर और कहानी लेखन।
शेअर करेंAdvertisement
मैंने समझा : आत्मकथा के इस अंश में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी ने भारत के 'पृथ्वी' और 'अग्नि' मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) के प्रक्षेपण में आने वाली कठिनाइयों और वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम व टीम-भावना का वर्णन किया है। इस पाठ से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि किसी भी महान कार्य में बाधाएँ अवश्य आती हैं, परंतु संकट के समय कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और सफलता को ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए।
स्वाध्याय (पाठ के आधार पर)
- (क) 'पृथ्वी' प्रक्षेपण के लिए श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र में विशेष सुविधाएँ स्थापित कीं। [थुंबा, श्रीहरिकोटा]
- (ख) सिर्फ छह सौ सेकंड्स की भव्य उड़ान ने हमारी सारी थकान को एक पल में धो डाला। [मिनट, सेकंड्स]
(च) भारत को चुनिंदा राष्ट्रों के समूह में किसने पहुँचा दिया ?
'पृथ्वी' प्रक्षेपास्त्र (मिसाइल) के सफल प्रक्षेपण ने निर्देशित मिसाइलों के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर देश बना दिया। सामर्थ्यशील नागरिक अंतरिक्ष उद्योग और व्यवहार्य मिसाइल आधारित सुरक्षा प्रणालियों ने भारत को दुनिया के चुनिंदा राष्ट्रों के समूह में पहुँचा दिया।
(छ) टीम के साथ डॉ. कलाम जी ने कौन-सा अनुभव बाँटा ?
प्रक्षेपण स्थगित होने पर जब टीम सदमे में थी, तब डॉ. कलाम जी ने 'एस.एल.वी.-३' (SLV-3) का अपना अनुभव बाँटा। उन्होंने कहा, "मेरा प्रक्षेपणयान तो गिरकर समुद्र में खो गया था, लेकिन उसकी वापसी सफलता के साथ हुई। आपकी मिसाइल अभी तक आपके सामने है, आपने कुछ भी ऐसा नहीं खोया है जिसे एक-दो हफ्तों के काम से सुधारा न जा सके।"
(ज) 'अग्नि' का प्रक्षेपण पहले स्थगित क्यों करना पड़ा ?
२० अप्रैल १९८९ को 'अग्नि' का प्रक्षेपण निर्धारित था। जब प्रक्षेपण में केवल १४ सेकंड (T-14) बचे थे, तब कंप्यूटर ने संकेत दिया कि उपकरणों में से कोई एक ठीक से काम नहीं कर रहा है। इस बीच निचली रेंज केंद्र ने 'होल्ड' के लिए कहा और अगले कुछ सेकंडों में जगह-जगह 'होल्ड' की जरूरत पड़ गई, इसलिए प्रक्षेपण स्थगित करना पड़ा।
(झ) रक्षामंत्री ने डॉ. कलाम जी से कब और क्या पूछा था ?
'अग्नि' मिसाइल के सफल प्रक्षेपण से एक दिन पूर्व, खामोशी को तोड़ते हुए रक्षामंत्री महोदय ने डॉ. कलाम जी से पूछा था, "कलाम! कल तुम 'अग्नि' की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए मुझसे क्या उपहार चाहोगे?"
Advertisement
भाषा की ओर (व्याकरण)
| मूल शब्द | उपसर्ग लगाकर शब्द (वाक्य) | प्रत्यय लगाकर शब्द (वाक्य) |
|---|---|---|
| दिन | प्रतिदिन (प्रति + दिन) मैं प्रतिदिन विद्यालय जाता हूँ। |
दिनभर (दिन + भर) हमें दिनभर नहीं खेलना चाहिए। |
| नम्र | विनम्र (वि + नम्र) बड़ों के साथ हमेशा विनम्र व्यवहार करना चाहिए। |
नम्रता (नम्र + ता) संत ज्ञानेश्वर के स्वभाव में बहुत नम्रता थी। |
| डर | निडर (नि + डर) भारतीय सैनिक बहुत निडर होते हैं। |
डरपोक (डर + पोक) अंधेरे से डरने वाला लड़का बहुत डरपोक है। |
| जल | निर्जल (निर् + जल) एकादशी के दिन मेरी दादी निर्जल उपवास करती हैं। |
जलीय (जल + ईय) मछली और कछुआ जलीय प्राणी हैं। |
| साहस | दुस्साहस (दुस् + साहस) चोर ने पुलिस के सामने चोरी करने का दुस्साहस किया। |
साहसी (साहस + ई) छत्रपति शिवाजी महाराज एक साहसी योद्धा थे। |
| सत्य | असत्य (अ + सत्य) हमें कभी किसी से असत्य नहीं बोलना चाहिए। |
सत्यता (सत्य + ता) इस अफ़वाह की सत्यता पर मुझे संदेह है। |
उपसर्ग (Prefix) : जो शब्दांश मूल शब्द के आगे जुड़कर अर्थ बदल देते हैं (जैसे- प्रति, वि, नि)।
प्रत्यय (Suffix) : जो शब्दांश मूल शब्द के पीछे जुड़कर नया शब्द बनाते हैं (जैसे- भर, ता, ई)।
अन्य कृतियाँ
कहानी का शीर्षक : भलाई का फल (या परोपकार का इनाम)
एक गाँव में बहुत बड़ा मेला लगा था। लोग खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ मेला देखने जा रहे थे। सड़क पर मेले के प्रवेश द्वार के ठीक बीचोंबीच एक बड़ा-सा पत्थर पड़ा हुआ था। मेले की जल्दी में कई छोटे बच्चे और बुजुर्ग उस पत्थर से टकराकर गिर रहे थे और उन्हें चोट लग रही थी, लेकिन कोई भी उस पत्थर को रास्ते से हटाने की परवाह नहीं कर रहा था।
राजू नाम का एक समझदार लड़का बहुत देर से यह सब देख रहा था। उसे लोगों का इस तरह गिरना अच्छा नहीं लगा। उसने तुरंत पास जाकर अपनी पूरी ताकत से उस भारी पत्थर को रास्ते से किनारे हटा दिया। जैसे ही उसने पत्थर हटाया, उसे पत्थर के नीचे एक लिफाफा (चिट्ठी) और रुपयों से भरी एक छोटी-सी थैली मिली।
राजू ने चिट्ठी खोली। चिट्ठी में लिखा था, "यह इनाम उस नेक इंसान के लिए है जो इस रास्ते से पत्थर हटाकर दूसरों की भलाई करेगा।" दरअसल, यह पत्थर गाँव के सरपंच ने लोगों की परीक्षा लेने के लिए रखवाया था। राजू की इस निस्वार्थ भलाई के लिए सरपंच ने उसे पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
सीख : हमें हमेशा दूसरों की भलाई और परोपकार के बारे में सोचना चाहिए। अच्छे काम का फल हमेशा अच्छा ही मिलता है।
यदि मैं अंतरिक्ष यात्री (Astronaut) बन जाऊँ, तो मैं अंतरिक्ष यान में बैठकर शून्य गुरुत्वाकर्षण (Zero gravity) में उड़ने का अद्भुत आनंद लूँगा। मैं अंतरिक्ष से हमारी नीली पृथ्वी को देखूँगा और उसकी सुंदर तस्वीरें खींचकर दुनिया वालों को दिखाऊँगा। मैं दूसरे ग्रहों और तारों के रहस्य जानने की कोशिश करूँगा और यह पता लगाऊँगा कि क्या ब्रह्मांड में कहीं और भी जीवन संभव है। मैं अपने देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करूँगा।