८. गजल
कवि — माणिक वर्मा | संपूर्ण स्वाध्याय, अभिव्यक्ति और उपयोजित लेखन — महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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कवि परिचय : हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर माणिक वर्मा जी की गजलें बहुत ही प्रेरणादायी होती हैं। प्रस्तुत गजल के अधिकांश शेरों में वर्मा जी ने हम सबको अपने रूप-रंग से सुंदर दिखने के बजाय अपने अच्छे कर्मों से सुंदर दिखने के लिए प्रेरित किया है।
स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
१. नींव के अंदर दिखो
तात्पर्य : हमें केवल बाहरी दिखावे और प्रशंसा की चाह छोड़कर समाज के निर्माण में नींव के पत्थर के समान मजबूत और महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए, भले ही हमारा वह काम किसी को दिखाई न दे।
२. आईना बनकर दिखो
तात्पर्य : जीवन में कितनी भी परेशानियाँ और मुसीबतें (पत्थरों का शहर) क्यों न आएँ, हमें कभी टूटकर बिखरना नहीं चाहिए। हमें एक मजबूत आईने की तरह अडिग रहकर दूसरों को सत्य और प्रेरणा की राह दिखानी चाहिए।
- १. स्वर्णिम शिखर बनने के बजाय नींव का पत्थर बनना।
- २. सिर्फ दिखावे के लिए न जीकर एक सच्चा 'आदमी' बनकर दिखना।
- ३. वक्त की धुंध (कठिनाइयों) में एक रोशनी बनकर दिखना।
- ४. किसी धागे की तरह जलकर दूसरों (मोम) के भीतर अपनापन दिखाना और उनके दर्द को समझना।
- भीड़ : कवि को किस जगह पर एक ऐसी शक्ल देखने की चाह है जो उन्हें अक्सर दिखे?
- जुगनू : वक्त की धुंध में 'मैं भी तुम्हारे साथ हूँ', यह किसने कहा?
- तितली : कवि ने न खिलने वाले फूल पर किसके टूटे हुए पर (पंख) बनकर दिखने को कहा है?
- आसमान : कवि ने गर्द (धूल) बनकर किस पर लिखने की बात कही है?
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१. आपको महसूस होगी तब हरइक दिल की जलन,
जब किसी धागे-सा जलकर मोम के भीतर दिखो ।
जीवनमूल्य : परोपकार और सहानुभूति। हमें दूसरों के दुःख, तकलीफ और दर्द को समझने के लिए स्वयं उनके साथ खड़े होना चाहिए और उनके लिए त्याग करना चाहिए।
२. कोई ऐसी शक्ल तो मुझको दिखे इस भीड़ में,
मैं जिसे देखूँ उसी में तुम मुझे अक्सर दिखो ।
जीवनमूल्य : सर्वव्यापकता और इंसानियत। संसार में स्वार्थी लोगों की भीड़ बहुत है, ऐसे में हमें ऐसा इंसान बनना चाहिए जिसके कर्मों से चारों ओर मानवता और सच्चाई की झलक दिखाई दे।
अभिव्यक्ति
पसंदीदा पंक्तियाँ :
"सिर्फ देखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं,
आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखो ।
जिंदगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं,
पत्थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो ।"
केंद्रीय भाव :
इन पंक्तियों का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य का केवल बाहरी दिखावा या सुंदरता महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसके कर्म और इंसानियत मायने रखती है। हमें केवल अच्छे दिखने का प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि एक सच्चा और मानवीय गुणों वाला इंसान बनना चाहिए। जीवन की कठिन परिस्थितियों और स्वार्थी दुनिया (पत्थरों के शहर) में हमें अपने आदर्शों पर इतनी मजबूती से डटे रहना चाहिए कि हम समस्याओं के सामने टूटें नहीं, बल्कि एक अडिग आईने की तरह दूसरों को भी सत्य और साहस की राह दिखाएँ।
उपयोजित लेखन (निबंध)
यदि मेरा घर अंतरिक्ष में होता
यदि मेरा घर अंतरिक्ष में होता, तो मेरा जीवन बिल्कुल अलग और बहुत ही रोमांचक होता। मैं हर दिन अपनी खिड़की से नीली और सुंदर पृथ्वी को निहारता। मेरे घर के आस-पास गुरुत्वाकर्षण नहीं होता, इसलिए मैं हवा में तैरता हुआ अपने सारे काम करता। अंतरिक्ष में पृथ्वी की तरह कोई शोरगुल या प्रदूषण नहीं होता, बल्कि चारों ओर अनंत शांति और टिमटिमाते हुए तारे होते।
मैं रोज़ नए ग्रहों और क्षुद्रग्रहों को करीब से देखता। वहाँ मुझे घर से बाहर निकलने के लिए विशेष स्पेससूट पहनना पड़ता। खाना खाना और पानी पीना भी एक अनोखा अनुभव होता, क्योंकि सब कुछ हवा में तैरने लगता। मुझे अपनी पृथ्वी, प्रकृति और दोस्तों की याद तो बहुत आती, लेकिन अंतरिक्ष का वह जादुई वातावरण मुझे ब्रह्मांड के रहस्य जानने की नई प्रेरणा देता। मेरा अंतरिक्ष का घर सचमुच किसी विज्ञान-कथा के सच होने जैसा होता!