११. समता की ओर
कवि — मुकुटधर पांडेय | संपूर्ण स्वाध्याय, पद्य विश्लेषण, और उपयोजित लेखन। महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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कवि परिचय : मुकुटधर पांडेय जी ने प्रस्तुत कविता में शिशिर ऋतु (कड़ाके की ठंड) के दौरान धनवान और निर्धन व्यक्तियों की जीवन-शैली में अंतर दिखाया है, और समाज में बंधुता (भाईचारे) का संदेश दिया है।
स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
- प्रकृति में : प्रकृति द्युतिहीन (तेजहीन) हो गई है; तारे मलिन और चंद्रमा पीले रंग (पांडुवर्ण) का हो गया है।
- धरती पर : धरती (अवनि) पर धुंध (कुंझटिका) छाई हुई है, और तालों (तालाबों) में कमल के फूल पाले (तुषार) के कारण मुरझा (बिलखा) रहे हैं।
| धनी | दीन-दरिद्र (गरीब) |
|---|---|
| धनी लोग रात-दिन सुख-सुविधाओं से युक्त सुंदर घरों में मौज करते हैं। | गरीब लोग टूटे-फूटे घरों में रहते हैं, जहाँ हमेशा उदासी छाई रहती है। |
| उन्हें खाने के लिए ताजी दूध-मलाई और हलवा-पूड़ी मिलती है। | उन्हें खाने के लिए सूखी रोटी भी मुश्किल से मिलती है, और सब्जी (भाजी) तो बिल्कुल नहीं। |
| वे ठंड से बचने के लिए कीमती शाल-दुशाले ओढ़ते हैं। | उनके काँपते हुए शरीर (बदन) पर कड़ाके की ठंड और पाला गिरता है। |
| ऋतुएँ | अंग्रेजी माह | हिंदी माह |
|---|---|---|
| १. वसंत | मार्च, अप्रैल | चैत्र, बैसाख |
| २. ग्रीष्म | मई, जून | ज्येष्ठ, आषाढ़ |
| ३. वर्षा | जुलाई, अगस्त | श्रावण, भाद्रपद |
| ४. शरद | सितंबर, अक्टूबर | आश्विन, कार्तिक |
| ५. हेमंत | नवंबर, दिसंबर | मार्गशीर्ष, पौष |
| ६. शिशिर | जनवरी, फरवरी | माघ, फाल्गुन |
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| १. रचनाकार | मुकुटधर पांडेय |
| २. रचना का प्रकार | कविता (छायावादी) |
| ३. पसंदीदा पंक्ति | "हमको भाई का करना उपकार नहीं क्या होगा, भाई पर भाई का कुछ अधिकार नहीं क्या होगा।" |
| ४. पसंदीदा होने का कारण | इन पंक्तियों में कवि ने अमीर-गरीब के भेदभाव को मिटाकर भाईचारे (बंधुता) का बहुत ही सुंदर और मर्मस्पर्शी संदेश दिया है। |
| ५. रचना से प्राप्त संदेश | इस कविता से हमें यह संदेश मिलता है कि समाज में अमीर और गरीब दोनों एक ही माता (प्रकृति) की संतान हैं और आपस में भाई-भाई हैं। इसलिए धनवानों को अपने गरीब और असहाय भाइयों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि एक भाई का दूसरे भाई पर अधिकार होता है। |
अंतिम पंक्तियाँ : "हमको भाई का करना उपकार नहीं क्या होगा, / भाई पर भाई का कुछ अधिकार नहीं क्या होगा ।"
संदेश : कवि इन पंक्तियों के माध्यम से समाज के धनवान और साधन-संपन्न लोगों से सवाल करते हैं कि क्या उन्हें अपने गरीब भाइयों की भलाई (उपकार) नहीं करनी चाहिए? सभी मनुष्य एक ही प्रकृति माता की संतान हैं, इसलिए वे सब आपस में भाई-भाई हैं। एक भाई का दूसरे भाई पर अधिकार होता है कि संकट के समय वह उसकी मदद करे। अतः हमें स्वार्थ त्यागकर गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता करनी चाहिए।
उपयोजित लेखन
विश्वबंधुता : वर्तमान युग की माँग
आज दुनिया तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत आगे बढ़ चुकी है। दुनिया एक 'ग्लोबल विलेज' (वैश्विक गाँव) बन गई है, लेकिन विडंबना यह है कि लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। स्वार्थ, आतंकवाद, युद्ध और नफरत के कारण मानवता संकट में है। ऐसे कठिन समय में 'विश्वबंधुता' (विश्व भाईचारा) ही एकमात्र ऐसा उपाय है जो पूरी दुनिया को बचा सकता है।
विश्वबंधुता का अर्थ है— पूरी दुनिया के लोगों को अपना परिवार मानना (वसुधैव कुटुम्बकम्)। जब हर व्यक्ति, धर्म, जाति और देश की सीमाओं से ऊपर उठकर एक-दूसरे से प्रेम करेगा और सम्मान देगा, तभी दुनिया में सच्ची शांति स्थापित हो सकेगी। युद्ध की जगह संवाद और नफरत की जगह सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए। यदि हम विश्वबंधुता को अपनाएँगे, तो हमारा संसार एक सुंदर और सुरक्षित स्थान बन जाएगा।