4. हरिद्वार
भारतेंदु हरिश्चंद्र का यात्रा-पत्र — सार, मेरी समझ से, मिलान, चयन, आदरार्थ बहुवचन, काल, पत्र-लेखन, आज की हिंदी में रूपांतरण और आज की पहेली के उत्तर।
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पाठ का परिचय : ‘हरिद्वार’ भारतेंदु हरिश्चंद्र का लिखा एक पत्र है। उन्होंने 1871 ई. में हरिद्वार की यात्रा की थी। ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के संपादक को पत्र लिखकर उन्होंने हरिद्वार की प्रकृति, गंगा, घाटों और वहाँ के लोगों का सुंदर वर्णन किया है। इस पत्र की हिंदी लगभग 150 वर्ष पुरानी है।
पाठ का सार
हरिद्वार तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरा है। पर्वतों पर लताएँ फैली हैं। बड़े-बड़े वृक्ष साधुओं की तरह धूप, ओस और वर्षा सहते हैं। वृक्ष फल, फूल, छाया, लकड़ी — सब कुछ देकर लोगों की इच्छा पूरी करते हैं। पक्षी निडर होकर चहचहाते हैं।
गंगा का जल बहुत ठंडा, मीठा और साफ है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बँटी है — नील धारा और गंगा। हरि की पैड़ी पर लोग स्नान करते हैं। यहाँ पाँच मुख्य तीर्थ हैं — हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, बिल्वपर्वत और कनखल। यहाँ के पंडे बड़े संतोषी हैं।
लेखक ने गंगा तट पर पत्थर पर बैठकर भोजन किया। उन्हें वह सुख सोने की थाली के भोजन से बढ़कर लगा। लेखक कहते हैं कि उनका मन अब भी वहीं बसा है।
मेरी समझ से
उत्तर : लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
उत्तर : मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
उत्तर : संतुष्टि में सुख होता है।
उत्तर : सादगी और आत्मनिर्भरतास्वच्छता और प्रकृति प्रेम
उत्तर : आध्यात्मिकप्राकृतिक
उत्तर : सरलता और चित्रात्मकता
(ख) अपने उत्तर मित्रों के उत्तरों से मिलाइए और कारणों पर चर्चा कीजिए। (कक्षा-गतिविधि)
मिलकर करें मिलान
| शब्द | संदर्भ |
|---|---|
| 1. हरिद्वार | उत्तराखंड राज्य का प्रसिद्ध तीर्थस्थान। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
| 2. गंगा | भारत की प्रधान नदी जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं — भागीरथी, त्रिपथगा आदि। |
| 3. भगीरथ | अयोध्या के सूर्यवंशी राजा, जो तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए। |
| 4. चण्डिका | मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। |
| 5. भागवत | अठारह पुराणों में सबसे प्रसिद्ध पुराण, जिसमें अधिकांश श्रीकृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
| 6. दालचीनी | एक पेड़, जिसकी सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम आती है। |
मिलकर करें चयन
| पंक्ति | सही निष्कर्ष |
|---|---|
| 1. पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली... सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है। | लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। |
| 2. बड़े-बड़े वृक्ष... साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। | वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं। |
| 3. इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी... निडर होकर कल्लोल करते हैं। | यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। |
| 4. जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी... | गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है। |
| 5. एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके... भोजन किया। | लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है। |
| 6. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। | लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर प्रकाशित किया जाए। |
पंक्तियों पर चर्चा
हरिद्वार की कुशा घास में दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंध आती है। लेखक कहते हैं कि यह भूमि इतनी पवित्र है कि यहाँ की साधारण घास भी सुगंधित है।
वृक्षों का जीवन धन्य है। उनके पास से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। वे फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ देते हैं। जलने के बाद भी कोयला और राख देकर काम आते हैं। वृक्ष सच्चे परोपकारी हैं।
सोच-विचार के लिए
यह वाक्य दर्शाता है कि लेखक को हरिद्वार बहुत अच्छा लगा। लौटने के बाद भी उनका मन वहीं बसा है।
हाँ, गर्मी की छुट्टियों में मैं नानी के गाँव गया था। लौटने के कई दिन बाद तक मुझे वहाँ के खेत, नदी और नानी की बातें याद आती रहीं।
आज ऐसे संतोषी लोग कम मिलते हैं। अधिकतर लोग अधिक धन कमाना चाहते हैं। फिर भी कुछ लोग आज भी संतोषी हैं। जैसे हमारे गाँव के एक बुजुर्ग दर्जी कम पैसे लेकर भी खुशी से सबके कपड़े सिलते हैं।
वह बंगला ऊँचाई पर था। वहाँ चारों ओर से शीतल हवा आती थी। वहाँ से गंगा और पर्वतों का सुंदर दृश्य दिखता होगा। वहाँ शांति थी और लोग भी अच्छे थे। इसलिए लेखक ने उसे टिकने योग्य कहा।
- वृक्ष हमें फल, फूल और छाया देते हैं।
- पत्ते, छाल और जड़ से दवाइयाँ बनती हैं।
- लकड़ी से घर, फर्नीचर और ईंधन मिलता है।
- जलने के बाद भी कोयला और राख काम आते हैं।
- वृक्ष बिना कुछ माँगे सब कुछ देते हैं। इसलिए हमें उनकी रक्षा करनी चाहिए।
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अनुमान और कल्पना से
मैं हर की पैड़ी पर गंगा स्नान करूँगा। शाम की गंगा आरती देखूँगा। पहाड़ी पर चंडी देवी के मंदिर तक रोपवे से जाऊँगा। गंगा के किनारे बैठकर बहते पानी की आवाज सुनूँगा।
ठंडे-ठंडे छींटे मुँह पर पड़ते ही सारी थकान दूर हो गई। ऐसा लगा मानो गंगा माँ प्यार से मेरा मुँह धो रही हो। मन ताजगी और खुशी से भर गया।
पेड़ हमसे बात करेंगे। काटने वालों को डाँटेंगे और पानी देने वालों को धन्यवाद देंगे। प्यासे होने पर पानी माँगेंगे। शायद वे चलकर छाया देने हमारे पास भी आ जाएँ।
लेखक गंगा को माँ और देवी मानते थे। उनके मन में गंगा के प्रति बहुत आदर और श्रद्धा थी। इसलिए उन्होंने ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया।
- दृष्टिबाधित साथी को हाथ पकड़कर घाट की सीढ़ियों पर सावधानी से ले जाऊँगा।
- उसे आस-पास के दृश्य बोलकर बताऊँगा।
- गंगा का जल, फूल और कुशा छूकर अनुभव कराऊँगा।
- श्रवणबाधित साथी से इशारों और लिखकर बात करूँगा।
- भीड़ में उसका साथ नहीं छोड़ूँगा।
लिखें संवाद
लेखक — कल्लू जी, देखिए गंगा का जल कितना निर्मल है!
कल्लू जी — सच कहा। और ठंडा भी इतना कि मन तृप्त हो जाए।
लेखक — आज रात ग्रहण है। हम भी स्नान करेंगे।
कल्लू जी — जरूर! और कल गंगा तट पर ही रसोई बनाकर भोजन करेंगे।
पर्वत — स्वागत है यात्री! हम तीनों ओर से इस पावन भूमि की रक्षा करते हैं।
लेखक — आप पर फैली हरी लताएँ बहुत सुंदर हैं।
पर्वत — धन्यवाद! बस यहाँ आने वाले लोग हमें गंदा न करें।
लेखक — मैं अपने पत्र में सबसे यही कहूँगा।
‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग
- प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं, वे अभी सभा में उपस्थित हैं।
- माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
- मेरी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से किताबें ले आएगी।
- बाहर फेरीवाला आया है। उसे बुला लाओ।
- डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ।
- आप तो बहुत दिन बाद आए हैं, आपका स्वागत है।
- डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं, उनसे परामर्श लेना चाहिए।
- आपके माता-पिता कहाँ हैं? क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?
- ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं, हम इनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
- बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है।
भावों की पहचान
- उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। — संतोष
- चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। — भक्ति / वैराग्य
- पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। — संतोष
- हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी। — शांति
- सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं। — परोपकार
काल की पहचान
- निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। — भविष्य काल
- यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। — वर्तमान काल
- वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। — वर्तमान काल
- चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। — भूतकाल
- मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। — भूतकाल
- भूतकाल — यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी।
- भविष्य काल — वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे।
- वर्तमान काल — चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
- भविष्य काल — मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिकूँगा।
- भूतकाल — आपने इस पत्र को स्थानदान दिया।
पत्र की रचना
| पत्र की विशेषता | पत्र से उदाहरण |
|---|---|
| 1. व्यक्तिपरकता | मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है… |
| 2. संवादात्मकता | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… |
| 3. स्वाभाविक शैली | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…” |
| 4. व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके… / “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…” |
| 5. अभिवादन या संबोधन | श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु! |
| 6. हस्ताक्षर | आपका मित्र — यात्री |
| 7. उपसंहार और निवेदन | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ... निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
| 8. मुख्य विषय-वस्तु | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, गंगा स्नान आदि का विस्तार से वर्णन — “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” |
पत्र
ब-12, शिवाजी नगर,
पुणे।
दिनांक : 10 जून 20XX
प्रिय मित्र रोहन,
सप्रेम नमस्ते।
मैं यहाँ कुशल हूँ और आशा करता हूँ कि तुम भी कुशल होगे। इन छुट्टियों में मैं परिवार के साथ महाबलेश्वर गया था। वहाँ चारों ओर हरे-भरे पहाड़ थे। सुबह-सुबह बादल हमारे पास से गुजरते थे। हमने वेण्णा झील में नौका-विहार किया और ताजी स्ट्रॉबेरी खाई। सूर्यास्त का दृश्य तो कभी नहीं भूलूँगा।
तुम भी अगली छुट्टियों में वहाँ जरूर जाना। चाचा-चाची को मेरा प्रणाम कहना।
तुम्हारा मित्र,
अमित
शब्द से जुड़े शब्द
लेखन के अनोखे तरीके
- वृक्ष-साधु : “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।”
- गंगाजल-चीनी : “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।”
- हरियाली-गलीचा : “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
- धारा-भगीरथ की कीर्ति : “श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।”
- इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं। वे शहर के दुष्ट शिकारियों से निडर होकर आनंद से खेलते हैं।
- वर्षा के कारण चारों ओर हरियाली ही दिखाई देती थी। ऐसा लगता था मानो यात्रियों के आराम के लिए हरा कालीन बिछा हो।
- यह इतना पवित्र तीर्थ है कि यहाँ इच्छा और क्रोध से भरे लोग रहते ही नहीं।
- वहाँ पहुँचते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शुद्ध हो गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
- यहाँ रात को ग्रहण लगा। हमने ग्रहण के समय आनंद से स्नान किया और दिन में श्रीमद्भागवत का पाठ किया।
- उस समय पत्थर पर बैठकर भोजन करने का सुख सोने की थाली में भोजन करने से कहीं अधिक था।
- मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को अपनी पत्रिका में स्थान देंगे।
- शिषर → शिखर
- जात्रियों → यात्रियों
- मनोर्थ → मनोरथ
- प्रगट → प्रकट
- ठंढे → ठंडे
- बरफ → बर्फ
- कनों → कणों
- खानि → खान
- विल्व → बिल्व
- बढ़ के → बढ़कर
पाठ से आगे
हाँ, विद्यालय की पिकनिक में हमने नदी किनारे पेड़ों की छाया में भोजन किया था। ठंडी हवा चल रही थी और पक्षी चहचहा रहे थे। सब दोस्त साथ थे। साधारण भोजन भी घर से अधिक स्वादिष्ट लगा।
एक बार दादी ने अपने हाथ से मेरे लिए ऊन का छोटा-सा रूमाल बुना। वह साधारण रूमाल था, पर उसमें दादी का प्यार था। उसे पाकर मुझे बहुत सुख मिला।
मुझे गाँव के तालाब के किनारे बने पुराने मंदिर में जाकर शांति मिलती है। वहाँ की घंटियों की आवाज, पेड़ों की छाया और शांत पानी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। वहाँ जाते ही मन शांत हो जाता है।
हमारे आँगन में एक नीम का पेड़ है। इसे मेरे दादाजी ने लगाया था। गरमी में हम इसकी छाया में खेलते हैं। इसकी पत्तियाँ दवा के काम आती हैं। इसलिए मुझे इस पेड़ से विशेष लगाव है।
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण : “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर समूह में जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए। नारे के उदाहरण — “नदी में कचरा नहीं, नदी हमारी माता है।” “पेड़ लगाओ, धरती बचाओ।”
स्वास्थ्य और योग
मैंने आँखें बंद कीं और पाँच मिनट चुपचाप बैठा रहा। पहले मुझे पंखे की आवाज, बाहर गाड़ियों का शोर और पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दी। फिर मैंने अपनी साँस पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे मन शांत होने लगा। आँखें खोलीं तो मैं ताजगी अनुभव कर रहा था।
आदर्श विद्यालय, नागपुर
सूचना
दिनांक : 18 जून 20XX
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
सभी विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि 21 जून को सुबह 7 बजे विद्यालय के मैदान में योग शिविर का आयोजन किया जाएगा। सभी विद्यार्थी सफेद खेल वेश में दरी या योग मैट लेकर समय पर उपस्थित हों।
प्रधानाचार्य
आदर्श विद्यालय
सज्जन वृक्ष : एक पौधा लगाइए, उसे नाम दीजिए और उसकी देखभाल के बारे में अपनी दैनंदिनी में नियमित रूप से लिखिए।
अपने शब्द
- अर्थ — ठंडा
- समानार्थी शब्द — ठंडा, शीत, सर्द
- विपरीतार्थक शब्द — उष्ण, गरम
- वाक्य प्रयोग — सुबह की शीतल हवा मन को ताजा कर देती है।
यात्रा के व्यय की गणना
| व्यय का विवरण | राशि |
|---|---|
| आने-जाने का बस किराया | ₹ 400 |
| भोजन और नाश्ता | ₹ 300 |
| प्रवेश टिकट | ₹ 100 |
| स्मृति चिह्न | ₹ 100 |
| आपात स्थिति के लिए बचत | ₹ 100 |
| कुल | ₹ 1000 |
मैं वहाँ की स्थानीय कारीगरी से बनी कोई छोटी वस्तु, जैसे लकड़ी का खिलौना, खरीदूँगा। यह सस्ता होगा और यात्रा की याद दिलाएगा। मैं उतना ही खर्च करूँगा जितना बजट में तय है।
यात्रा सबके लिए
- बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर और रैंप वाले रास्ते चुनूँगा।
- बीच-बीच में आराम का समय रखूँगा।
- सबकी पसंद और स्वास्थ्य के अनुसार भोजन की व्यवस्था करूँगा।
- बच्चों पर विशेष ध्यान रखूँगा ताकि वे भीड़ में न खो जाएँ।
- सबको पीने का पानी और प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराऊँगा।
- लिखित सूचनाएँ और संकेत-चिह्न।
- सांकेतिक भाषा जानने वाला सहायक।
- मोबाइल पर लिखित संदेश की सुविधा।
- दृश्य संकेत, जैसे चमकने वाली लाइट।
- दीवारों पर कुछ नहीं लिखूँगा।
- कचरा कूड़ेदान में ही डालूँगा।
- मूर्तियों और नक्काशी को हाथ नहीं लगाऊँगा।
- वहाँ के नियमों का पालन करूँगा।
आज की पहेली
- एक मसाले का नाम — दालचीनी / जावित्री
- कपास से जुड़ा एक शब्द — जनेऊ
- जहाँ स्नान होता है — हरि की पैड़ी (घाट)
- वृक्ष के किसी अंग का नाम — फल, फूल, पत्ते, छाल, बीज, जड़ (कोई एक)
- एक नगर या तीर्थ का नाम — हरिद्वार / कनखल
- व्यापार से जुड़ा स्थान — दुकान
- एक नदी का नाम — गंगा
- एक पर्वत का नाम — विल्व (बिल्व) पर्वत
- एक धार्मिक ग्रंथ का नाम — श्री भागवत
झरोखे से : ‘हरिद्वार के मार्ग में’ पत्रांश में लेखक बया के घोंसलों की प्रशंसा करते हैं। बया अपने घोंसले काँटेदार बबूल पर बनाती है, ताकि वे सुरक्षित रहें।
खोजबीन के लिए : भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक ‘अंधेर नगरी’ पुस्तकालय या इंटरनेट से पढ़िए।