10. तरुण के स्वप्न
नेताजी सुभाषचंद्र बोस का उद्बोधन — सार, मेरी समझ से, मिलान, सोच-विचार, भाषा की बात, स्वतंत्रता सेनानी और नारे, तथा ‘भारति, जय, विजय करे!’ का भाव।
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पाठ का परिचय : ‘तरुण के स्वप्न’ नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक भाषण का अंश है। यह भाषण उन्होंने 29 दिसंबर 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में दिया था। इसमें उन्होंने एक स्वाधीन, संपन्न और समानता वाले समाज तथा राष्ट्र का स्वप्न युवाओं को उपहार के रूप में सौंपा है।
पाठ का सार
नेताजी कहते हैं कि देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति और आनंद का स्रोत था। आज हम उस स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं।
हमारा स्वप्न है — एक नया, सब ओर से स्वाधीन और संपन्न समाज तथा स्वाधीन राष्ट्र। उस समाज में व्यक्ति हर तरह से मुक्त हो। जातिभेद न हो। नारी को पुरुषों के समान अधिकार मिलें। धन की विषमता न हो। सबको शिक्षा और उन्नति का समान अवसर मिले। श्रम और कर्म का सम्मान हो, आलसी के लिए कोई स्थान न हो।
ऐसा राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा और विश्व के सामने आदर्श बनेगा। इस स्वप्न के लिए हर त्याग और हर संकट सहा जा सकता है। नेताजी यह स्वप्न युवाओं को उपहार में देते हैं और कहते हैं — स्वीकार करो।
मेरी समझ से
उत्तर : देश के तरुण वर्ग के लिएभारतवासियों के लिए
उत्तर : श्रम और कर्म की मर्यादा से
उत्तर : उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
उत्तर : राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
(ख) अपने उत्तर मित्रों के उत्तरों से मिलाइए और कारणों पर चर्चा कीजिए। (कक्षा-गतिविधि)
मिलकर करें मिलान
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
|---|---|
| 1. “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं... काम-काज करते हैं।” | हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं। |
| 2. “जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा... भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।” | जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
| 3. “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।” | समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
पंक्तियों पर चर्चा
समाज में अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर न हो। सबको जीवन की मूल आवश्यकताएँ पूरी करने लायक धन और साधन मिलें।
चित्तरंजन दास का स्वप्न ही उनकी शक्ति का स्रोत था। उसी से उन्हें काम करने की ऊर्जा मिलती थी। जैसे झरने से लगातार पानी बहता है, वैसे ही उस स्वप्न से उन्हें लगातार आनंद मिलता था।
व्यक्ति हर तरह से स्वतंत्र हो — विचार, शिक्षा, काम, धर्म और जीवन जीने में। उस पर जाति, धन या समाज का कोई अनुचित दबाव न हो।
सोच-विचार के लिए
नेताजी ने एक ऐसे स्वाधीन और संपन्न राष्ट्र का स्वप्न देखा था जिसमें —
- व्यक्ति हर तरह से मुक्त हो।
- जातिभेद न हो।
- नारी को पुरुषों के समान अधिकार मिलें।
- धन की विषमता न हो।
- सबको शिक्षा और उन्नति के समान अवसर मिलें।
- श्रम और कर्म का सम्मान हो।
- राष्ट्र विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर विश्व के लिए आदर्श बने।
नेताजी ने आदर्श समाज और आदर्श स्वाधीन राष्ट्र के स्वप्न को साकार करने को ही अपने जीवन की सार्थकता माना। वे कहते हैं कि यही स्वप्न उनके छोटे-से जीवन को सार्थक बनाता है।
कोई भी राष्ट्र परिश्रम से ही आगे बढ़ता है। आलसी लोग देश की प्रगति में बाधा बनते हैं। नेताजी चाहते थे कि हर व्यक्ति मेहनत करे और देश के निर्माण में भाग ले।
- मन लगाकर पढ़ाई करना और कौशल सीखना।
- जाति, धर्म और लिंग के भेदभाव का विरोध करना।
- स्वदेशी वस्तुओं और स्टार्टअप को बढ़ावा देना।
- ईमानदारी और परिश्रम से काम करना।
- गरीबों को पढ़ाने और समाज सेवा में भाग लेना।
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अनुमान और कल्पना से
उस समय स्त्रियों को शिक्षा, संपत्ति और समाज में बराबर अधिकार नहीं थे। उन्हें घर तक सीमित रखा जाता था। नेताजी जानते थे कि आधी आबादी को पीछे रखकर देश आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए उन्होंने नारी की समानता पर जोर दिया।
उस समय की सभाओं में अधिकतर पुरुष ही आते थे। साथ ही ‘भाइयो’ उस समय का प्रचलित संबोधन था, जिसमें सभी श्रोताओं को शामिल माना जाता था। उनके भाषण में नारी की समानता की बात से साफ है कि वे स्त्रियों को भी बराबर मानते थे।
युवा श्रोता जोश और उत्साह से भर गए होंगे। उन्होंने तालियाँ बजाकर और ‘वंदे मातरम्’ के नारों से नेताजी का समर्थन किया होगा। बहुत से युवाओं ने देश की सेवा का संकल्प लिया होगा।
शीर्षक
यह भाषण तरुणों (युवाओं) को संबोधित है। इसमें नेताजी अपना स्वप्न युवाओं को सौंपते हैं, ताकि वे उसे पूरा करें। इसलिए यह शीर्षक उचित है।
मैं इसका नाम ‘आदर्श राष्ट्र का सपना’ रखूँगा, क्योंकि पूरा भाषण एक आदर्श समाज और राष्ट्र के सपने के बारे में है।
मैं स्वच्छता, पानी की बचत, मोबाइल का सीमित उपयोग, आपसी सहयोग और लड़के-लड़कियों की समानता जैसे विषयों पर बोलूँगा। मेरे उद्बोधन का शीर्षक होगा — ‘हम बदलेंगे, देश बदलेगा’।
भाषा की बात
| विशेषण | विशेष्य |
|---|---|
| अखंड | सत्य |
| क्षुद्र | जीवन |
| सर्वांगीण, स्वाधीन, संपन्न | समाज |
| असीम | शक्ति |
| स्वाधीन | राष्ट्र |
| अपार | आनंद |
- शाश्वत सत्य — सत्य कभी नहीं बदलता।
- सफल जीवन — मेहनत से जीवन सफल बनता है।
- शिक्षित समाज — शिक्षा से ही समाज आगे बढ़ता है।
- आत्मिक शक्ति — मन की शक्ति सबसे बड़ी होती है।
- आत्मनिर्भर राष्ट्र — जो अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करे।
- सच्चा आनंद — दूसरों की मदद से मिलता है।
विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग
| शब्द | विपरीतार्थक शब्द |
|---|---|
| स्वीकार | अस्वीकार |
| सार्थक | निरर्थक |
| विषमता | समानता |
| क्षुद्र | विशाल / वृहत / विराट / महान |
| संपन्न | विपन्न |
| अकर्मण्य | कर्मण्य / कर्मठ |
| मरण | जीवन |
- शिक्षक ने मेरा निवेदन स्वीकार किया, पर उसका अनुचित प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
- मेहनत से किया गया काम सार्थक होता है, आलस्य में बीता समय निरर्थक।
- समाज में विषमता नहीं, समानता होनी चाहिए।
- क्षुद्र मन वाला व्यक्ति नहीं, विशाल हृदय वाला व्यक्ति ही महान बनता है।
- संपन्न लोगों को विपन्न लोगों की सहायता करनी चाहिए।
- समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।
- वीर सैनिक मरण से नहीं डरते, वे देश के लिए जीवन अर्पित कर देते हैं।
पाठ से आगे
- विद्यालय — हर कक्षा में पुस्तकालय, कंप्यूटर और खेल का मैदान हो।
- राज्य — हर गाँव में अच्छी सड़कें, अस्पताल और स्वच्छ पानी हो।
- देश — भारत गरीबी और भेदभाव से मुक्त होकर विज्ञान और तकनीक में दुनिया का अग्रणी देश बने।
- संविधान और कानून का पालन करें।
- सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें।
- 18 वर्ष के होने पर मतदान अवश्य करें।
- देश की एकता बनाए रखें, किसी से भेदभाव न करें।
- ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाएँ।
मिलान कीजिए — स्वतंत्रता सेनानी
| तथ्य | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| 1. 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने वाले, ‘शहीद-ए-आज़म’ | भगत सिंह |
| 2. ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु | चित्तरंजन दास |
| 3. जेल में भूख हड़ताल के तिरसठवें दिन देहांत | जतिन दास |
| 4. जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ | महात्मा गाँधी |
| 5. नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ | सरदार वल्लभभाई पटेल |
| 6. “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।” | चंद्रशेखर आजाद |
देशबंधु चित्तरंजन दास
सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास
- संविधान ने सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार दिए।
- छुआछूत को कानूनन अपराध घोषित किया गया।
- सभी वयस्कों को मतदान का अधिकार मिला।
- 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया।
- पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण किया गया।
- हरित क्रांति से देश अन्न में आत्मनिर्भर बना।
- गरीबों के लिए रोजगार, भोजन और आवास की योजनाएँ चलाई गईं।
स्त्री सशक्तीकरण
- पंचायत और नगरपालिका में आरक्षण।
- लड़कियों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और मुफ्त साइकिल जैसी योजनाएँ।
- मातृत्व अवकाश की सुविधा।
- ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान।
- बसों और रेल में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें।
- संपत्ति में बेटियों को बराबर अधिकार।
स्त्रियों की टुकड़ी का नाम ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ था। इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया। इसमें महिलाओं को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने युद्ध में भाग लिया और घायल सैनिकों की सेवा भी की।
मेरे प्रिय स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं। उन्होंने आई.सी.एस. की ऊँची नौकरी छोड़कर देश-सेवा को चुना। उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाई और ‘जय हिंद’ तथा ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। उनका साहस और देश-प्रेम मुझे बहुत प्रेरित करता है।
स्वाधीनता संग्राम के नारे
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | बाल गंगाधर तिलक |
| करो या मरो | महात्मा गाँधी |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आजाद |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह |
| पूर्ण स्वराज | पं. जवाहरलाल नेहरू (लाहौर अधिवेशन, 1929) |
टिप्पणी : ‘इंकलाब जिंदाबाद’ नारा मौलाना हसरत मोहानी ने दिया था। भगत सिंह और उनके साथियों ने इसे पूरे देश में लोकप्रिय बनाया।
परियोजना कार्य : अलग-अलग राज्यों के 10 महिला और 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों का संग्रह बनाइए। एक राज्य से एक ही व्यक्ति चुनिए।
झरोखे से — साझी समझ
नेताजी ने पत्र में मिट्टी के खिलौने, बेंत का काम और सीप के बटन बनाने को गृह-उद्योग के रूप में शुरू करने की बात कही है। हमारे आस-पास भी पापड़-अचार बनाना, अगरबत्ती बनाना, टोकरी बुनना, सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे गृह उद्योग चलते हैं। इनसे घर बैठे लोगों, विशेषकर महिलाओं को रोजगार मिलता है।
खोजबीन के लिए : ‘आजाद हिंद फौज’ के विषय में और जानकारी जुटाकर कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
पढ़ने के लिए — भारति, जय, विजय करे!
यह निराला की संगीतमय कविता है। इसमें भारत माता की वंदना की गई है। कवि कहते हैं — हे भारत माता, तुम्हारी सदा जय और विजय हो। तुम्हारे हाथों में सुनहरी फसलें और कमल हैं।
लंका तुम्हारे चरणों में कमल के समान है। गरजती लहरों वाला सागर तुम्हारे पवित्र चरण धोता है। पेड़, घास, वन और लताएँ तुम्हारे वस्त्र हैं, जिन पर फूल जड़े हैं। गंगा की उजली धारा तुम्हारे गले का हार है। हिमालय की बर्फ तुम्हारा मुकुट है और ‘ॐ’ तुम्हारे प्राण हैं। सभी दिशाएँ तुम्हारे गुणगान से गूँज रही हैं।